क्या लंकापति रावण स्वयं भगवान शिव को लंका ले जा रहा था और गोला की धरती पर ऐसा क्या हुआ कि पूरी शक्ति लगाने के बावजूद वह शिवलिंग को दोबारा उठा नहीं सका? आखिर शिवलिंग पर दिखाई देने वाले निशान को रावण के अंगूठे से क्यों जोड़ा जाता है? लखीमपुर खीरी की ‘छोटी काशी’ गोला गोकर्णनाथ की कहानी आस्था, पौराणिक मान्यताओं और सदियों पुरानी लोकपरंपराओं से जुड़ी है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले का गोला गोकर्णनाथ केवल एक शहर नहीं बल्कि शिवभक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है। बाबा गोकर्णनाथ के प्रसिद्ध शिव मंदिर के कारण गोला को ‘छोटी काशी’ कहा जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में इस क्षेत्र को ‘उत्तर गोकर्ण क्षेत्र’ के नाम से भी जोड़ा जाता है।
सावन आते ही गोला का स्वरूप बदल जाता है। सड़कों पर भगवा वस्त्र पहने कांवड़ियों की कतारें, बोल बम और हर-हर महादेव के जयकारे सुनाई देने लगते हैं। शिवभक्त पवित्र जल लेकर बाबा गोकर्णनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं।
लेकिन इस मंदिर के पीछे एक ऐसी किंवदंती है, जिसका संबंध सीधे लंका के राजा रावण से जोड़ा जाता है।
रावण शिव को ले जाना चाहता था लंका?
लखीमपुर खीरी जिला प्रशासन की वेबसाइट पर दर्ज प्रचलित मान्यता के अनुसार, रावण ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे वरदान मांगने को कहा।
किंवदंती के अनुसार रावण ने भगवान शिव से अपने साथ लंका चलने की प्रार्थना की। शिव ने उसकी इच्छा स्वीकार की, लेकिन एक शर्त रखी—यात्रा के दौरान उन्हें जिस स्थान पर धरती पर रख दिया जाएगा, वे वहीं स्थापित हो जाएंगे।
रावण उन्हें लेकर लंका की ओर चल पड़ा।
गोला पहुंचते ही बदल गई कहानी
मान्यता है कि उस समय वर्तमान गोला क्षेत्र को गोलिहारा कहा जाता था। यहां पहुंचने पर रावण को कुछ समय के लिए रुकना पड़ा। उसने भगवान शिव के स्वरूप को एक चरवाहे को सौंप दिया और कहा कि वह उन्हें जमीन पर न रखे।
लेकिन चरवाहा भार अधिक देर तक संभाल नहीं पाया और उसने शिव को धरती पर स्थापित कर दिया।
वापस लौटे रावण ने उन्हें उठाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुआ।
कहा जाता है कि क्रोधित रावण ने शिवलिंग को अपने अंगूठे से दबाया। स्थानीय आस्था में शिवलिंग पर दिखाई देने वाले एक निशान को आज भी रावण के अंगूठे के निशान से जोड़ा जाता है।
यह एक धार्मिक लोकमान्यता है; इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं माना जाना चाहिए।
‘गोकर्णनाथ’ नाम का रहस्य
एक प्रचलित व्याख्या शिवलिंग के स्वरूप को गाय के कान यानी ‘गो-कर्ण’ जैसी आकृति से जोड़ती है। इसी से भगवान का नाम गोकर्णनाथ और आगे चलकर नगर का नाम गोला गोकर्णनाथ प्रचलित होने की मान्यता है।
इस क्षेत्र को धार्मिक परंपराओं में ‘उत्तर गोकर्ण क्षेत्र’ भी कहा गया है।
सावन में यहां क्यों पहुंचते हैं हजारों कांवड़िये?
श्रावण भगवान शिव की आराधना का विशेष महीना माना जाता है। शिवभक्त कांवड़ में पवित्र जल लेकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। समुद्र मंथन और भगवान शिव द्वारा हलाहल विष धारण करने की कथा से भी सावन में जलाभिषेक की परंपरा को जोड़ा जाता है।
गोला गोकर्णनाथ में यही परंपरा विशाल धार्मिक आयोजन का रूप ले लेती है। सावन के दौरान दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु कांवड़ लेकर बाबा गोकर्णनाथ के दरबार पहुंचते हैं और जलाभिषेक करते हैं।
आस्था के साथ इतिहास की भी पहचा
गोला गोकर्णनाथ मंदिर के वर्तमान निर्माणकाल और प्राचीन स्वरूप को लेकर अलग-अलग स्थानीय दावे और परंपराएं मिलती हैं। इसलिए मंदिर से जुड़ी त्रेतायुगीन घटनाओं को इतिहास के बजाय पौराणिक मान्यता और किंवदंती के रूप में समझना अधिक उचित है।
लेकिन एक बात निर्विवाद है—सदियों से बाबा गोकर्णनाथ की आस्था ने इस शहर की पहचान गढ़ी है। आज भी सावन में जब हजारों कांवड़िये ‘बोल बम’ के जयकारों के साथ गोला पहुंचते हैं तो पूरा नगर मानो शिवमय हो जाता है।
और शायद इसी आस्था में छिपा है ‘छोटी काशी’ गोला गोकर्णनाथ का सबसे बड़ा रहस्य।